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जमीन पर उतरा योगी का 'प्रयागराज', बदल गया DM दफ्तर का नाम

योगी सरकार द्वारा बदला गया इलाहाबाद के नाम का असर अब कागज से उतरकर सच्चाई में दिखने लगा है. इलाहाबाद के डीएम दफ्तर के बाहर जिलाधिकारी प्रयागराज के बैनर लग गए हैं. डीएम दफ्तर के बाहर की तस्वीर, फोटो क्रेडिट- पीटीआई उत्तर प्रदेश की  योगी  सरकार द्वारा कुंभनगरी  इलाहाबाद  पर बहस अभी पूरी तरह शांत भी नहीं हुई थी कि इसका असर जमीन पर दिखना शुरू हो गया है. आधिकारिक रूप से नाम बदलने के कुछ दिन बाद ही इलाहाबाद के जिला अधिकारी  दफ्तर  (DM दफ्तर) का नाम भी बदल गया है. डीएम ऑफिस के बाहर अब "जिला अधिकारी, प्रयागराज" का बैनर चस्पा कर दिया गया है. बता दें कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कैबिनेट ने 16 अक्टूबर को आधिकारिक रूप से इलाहाबाद का नाम बदलने का फैसला किया था. इस प्रस्ताव की मंजूरी राज्यपाल रामनाइक के द्वारा भी मिल गई थी. विपक्ष के निशाने पर था फैसला नाम बदलने की इस परंपरा पर विपक्ष की कई पार्टियों ने सवाल उठाए थे, कांग्रेस-सपा-बसपा ने इलाहाबाद का नाम बदलने का पुरजोर विरोध किया था. इसके अलावा सोशल मीडिया पर इस खबर ने काफी सुर्खियां ब...

इलाहाबाद अब फिर प्रयागराज हुआ, जानिए कैसे बदल गया था इसका नाम और किसने बदला था

लखनऊ.  उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने इलाहबाद का नाम फिर से प्रयागराज कर दिया है। यानी इस शहर को वही प्राचीनतम नाम फिर मिल गया है जो करीब चार सौ साल पहले था।  योगी  कैबिनेट ने मंगलवार को एक प्रस्ताव पारित कर मूल नाम प्रयागराज पर मुहर लगा दी और राज्यपाल भी इसे मंजूर कर चुके हैं। अब तमाम सरकारी विभागों को सूचित किया जाएगा कि वो इलाहबाद की जगह प्रयागराज नाम का ही इस्तेमाल करें। वैसे, योगी ने 14 अक्टूबर को ही इस बात का ऐलान कर दिया था कि इलाहाबाद का नाम सरकार प्रयागराज करने जा रही है अर्द्ध कुंभ के पहले फैसला  अगले साल प्रयागराज में अर्द्ध कुंभ लगने जा रहा है और धार्मिक दृष्टि से भी इसके मायने अहम हैं। यह अर्द्ध कुंभ अगले साल जनवरी में लगेगा। नाम बदले जाने को लेकर सियासी बयान आ रहे हैं और आ सकते हैं। लेकिन, ये सही है कि दुनिया के प्राचीनतम शहरों में से एक इस शहर का नाम मूल रूप से प्रयाग ही था। इसका जिक्र ऋगवेद में भी मिलता है। फिर इलाहाबाद कैसे हुआ? प्राप्त जानकारी के मुताबिक, मुगल शासक अकबर ने जब इस क्षेत्र पर कब्जा किया तो उसने यहां एक किल...

जानिए प्रयागराज से इलाहाबाद और फिर प्रयागराज बनने की कहानी |

उत्तर प्रदेश की योगी कैबिनेट ने मंगलवार को  इलाहाबाद शहर   का नाम बदलकर प्रयागराज करने के प्रस्ताव पर मुहर लगा दी. इसके साथ ही 444 साल बाद एक बार फिर  प्रयागराज  को उसका अपना पुराना नाम मिल गया. हिन्दू मान्यताओं के अनुसार गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती की वजह से इसे ऐतिहासिक रूप से तीर्थराज प्रयाग भी कहते हैं. रामचरित मानस जैसे पौराणिक ग्रंथों में भी प्रयागराज का जिक्र है. कहा जाता है कि कभी संगम के ही जल से देश के तमाम राजाओं-महाराजाओं का अभिषेक हुआ करता था. समय बीता और मुगलों का शासन आया. मुगल बादशाह अकबर ने 444 साल पहले 1574 में प्रयागराज का नाम बदलकर अल्लाहाबाद कर दिया. कालांतर में ये नाम इलाहाबाद हो गया. इसका जिक्र अकबरनामा और आईने अकबरी में भी किया गया है. वैसे धर्म के केंद्र के अलावा इलाहाबाद पढ़ाई के साथ राजनीति का भी अहम केंद्र रहा. आजादी से पहले जहां जवाहर लाल नेहरू की जन्मस्थली होने के कारण यहां स्थित आनंद भवन आजादी की लड़ाई और सत्ता के केंद्र में रहा. वहीं देश आजाद होने के बाद इलाहाबाद ने पढ़ाई में 'पूर्व का कैम्ब्रिज' दर्जा हासिल किया. इस शहर ने पू...

यूपीः सिनेमाघरों में राष्ट्रगान के बाद कुम्भ का लोगो दिखाना अनिवार्य

अवस्थी ने कहा कि इसे जल्द ही अमल में लाया जाएगा. ऐसा इसलिये किया जाएगा ताकि लोग इस धार्मिक आयोजन के उद्देश्य और महत्व को जान सकें. उन्होंने बताया कि नए लोगो में स्वास्तिक चिन्ह बना हुआ है और साधुओं का एक समूह पवित्र संगम में स्नान करता हुआ दिख रहा है. यूपी के CM योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के सिनेमाघरों में जल्द ही फिल्म शुरू होने से पहले सुनाये जाने वाले राष्ट्रगान के बाद कुम्भ मेले का नया प्रतीक चिन्ह लोगो भी अनिवार्य रूप से दिखाया जाएगा. प्रदेश के पर्यटन विभाग के प्रमुख सचिव अवनीश अवस्थी ने बताया कि प्रदेश के सिनेमाघरों में राष्ट्रगान के बाद कुम्भ मेले का लोगो भी दिखाना होगा. चलो कुम्भ चलो: 'यूपी नहीं देखा तो इंडिया नहीं देखा' अवस्थी ने कहा कि इसे जल्द ही अमल में लाया जाएगा. ऐसा इसलिये किया जाएगा ताकि लोग इस धार्मिक आयोजन के उद्देश्य और महत्व को जान सकें. उन्होंने बताया कि नए लोगो में स्वास्तिक चिन्ह बना हुआ है और साधुओं का एक समूह पवित्र संगम में स्नान करता हुआ दिख रहा है. उन्होंने कहा कि यह निर्णय सभी सरकारी पत्रों में कुम्भ का लोगो छापे जाने के म...

कुंभ मेले का इतिहास - कुम्भ पर्व विश्व का सबसे बड़ा सांस्कृतिक एवं धार्मिक आयोजन है।

आज के आधुनिक इलाहाबाद में स्थित प्रयाग का बतौर तीर्थ हिन्दुओं में एक महत्वपूर्ण स्थान है। परंपरागत तौर पर नदियों का मिलन बेहद पवित्र माना जाता है, लेकिन संगम का मिलन बेहद महत्वपूर्ण माना गया है। क्योंकि यहां गंगा, यमुना और सरस्वती का अद्भुत मिलन होता है। पौराणिक कथाओं के मुताबिक भगवान विष्णु अमृत से भरा कुंभ (बर्तन) लेकर जा रहे थें कि असुरों से छीना-झपटी में अमृत की चार बूंदें गिर गई थीं। यह बूंदें प्रयाग, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन रुपी तीर्थस्थानों में गिरीं। तीर्थ वह स्थान होता है जहां कोई भक्त इस नश्वर संसार से मोक्ष को प्राप्त होता है। ऐसे में जहां-जहां अमृत की बूंदें गिरी वहां तीन-तीन साल के अंतराल पर बारी-बारी से कुंभ मेले का आयोजन होता है। इन तीर्थों में भी संगम को तीर्थराज के नाम से जाना जाता है। संगम में हर बारह साल पर कुंभ का आयोजन होता है। भारत में महाकुंभ धार्मिक स्तर पर बेहद पवित्र और महत्वपूर्ण आयोजन है। इसमें लाखों लोग शिरकत करते हैं। महीने भर चलने वाले इस आयोजन में तीर्थयात्रियों के ठहरने के लिए टेंट लगा कर एक छोटी सी नगरी अलग से बसाई जाती है। यहां सुख-सुविधा क...